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जब जीवन में अचानक चुनौतियाँ बढ़ने लगती हैं, रिश्तों में मधुरता कम होने लगती है, पति–पत्नी के बीच दूरियाँ और मनमुटाव घर कर लेते हैं, या मन निरंतर तनाव और अस्थिरता से घिरा रहता है, तब मनुष्य भीतर से विचलित हो जाता है। ऐसे समय में महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती की शरण में जाना जीवन को नई दिशा देने वाला सिद्ध होता है। महाशिवरात्रि शिव–पार्वती के दिव्य मिलन का पर्व है, जिसे शास्त्रों में दांपत्य सुख, प्रेम और पारिवारिक संतुलन प्रदान करने वाला अत्यंत पावन पर्व माना गया है। इसलिए इस दिन किया गया शिव–पार्वती चढ़ावा अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
यह चढ़ावा न केवल जीवन की नकारात्मक ऊर्जा, मानसिक तनाव और वैवाहिक कष्टों को दूर करता है, बल्कि रिश्तों में आई कड़वाहट को भी समाप्त कर प्रेम, विश्वास और सामंजस्य को पुनः स्थापित करता है। जिन भक्तों के जीवन में बार-बार मतभेद, असंतोष या भावनात्मक दूरी आ रही हो, उनके लिए यह चढ़ावा सुखद परिवर्तन का माध्यम बनता है। उत्तराखंड में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर वह दिव्य स्थल है जहाँ स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती का पवित्र विवाह संपन्न हुआ था। मान्यता है कि महाशिवरात्रि जैसे महापर्व पर यहाँ अर्पित किया गया शिव–पार्वती चढ़ावा तुरंत स्वीकार होता है और शिव–शक्ति की संयुक्त कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। वायावेदा के माध्यम से आप इस महाशिवरात्रि पर शिव–पार्वती को चढ़ावा अर्पित कर रिश्तों में मधुरता, सुखद वैवाहिक जीवन और आजीवन दांपत्य सौहार्द का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं ताकि आपके जीवन में पुनः प्रेम, शांति और स्थिरता का प्रकाश फैल सके।
त्रियुगीनारायण मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक ऐतिहासिक और पवित्र स्थल है, जो उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रियुगीनारायण को हिमवत की राजधानी माना जाता था और यहीं पर भगवान शिव और देवी पार्वती का पवित्र विवाह हुआ था। कहा जाता है कि शिव और पार्वती का विवाह इसी विशाल हवन कुंड में हुआ था, जिसमें चारों दिशाओं में अग्नि प्रज्वलित की गई थी। इस दिव्य विवाह समारोह में ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं और संतों ने भाग लिया था। इस हवन कुंड की राख को आज भी भक्त अपने घर ले जाते हैं, और इसे अपने वैवाहिक जीवन के सुखमय होने के लिए एक आशीर्वाद मानते हैं।
त्रियुगीनारायण नाम इसी कारण पड़ा क्योंकि यहाँ तीन युगों के चिन्ह देखे जाते हैं, जो भगवान विष्णु, शिव और पार्वती के दिव्य संबंधों को दर्शाते हैं। इस मंदिर परिसर में चार महत्वपूर्ण कुंड स्थित हैं: रुद्राकुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्मकुंड और सरस्वती कुंड। इन कुंडों का जल बहुत पवित्र माना जाता है, और यही वह स्थान है जहाँ देवताओं ने शिव-पार्वती के विवाह के दौरान स्नान किया था। विशेष रूप से सरस्वती कुंड का जल विष्णु की नाभि से उत्पन्न माना जाता है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और भी बढ़ जाती है। इसलिए, पाप कर्मों से मुक्ति, वैवाहिक सुख एवं दांपत्य सामंजस्य एवं सुख समृद्धि के लिए चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा इस मंदिर में अत्यंत फलदायी माना जाता है। वायावेदा आपके नाम से यह अनुष्ठान संपन्न कराकर आशीर्वाद आपके घर तक पहुँचाता है।





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